शायद जीवन की एक तीसरी दिशा भी हुआ करती है जो न नदी के बहाव में बहती है और न ही बहाव के विरुद्ध.

Picture courtesy: galimohalla.in


नदी की तरह हम सब के जीवन में भी बहाव होता है, कभी तेज़ कभी धीमा. अलग अलग गति से आगे बढ़ते हमारे जीवन अक्सर हमें वहां ले जाते हैं जहाँ से किनारे नज़र नहीं आते. पीछे मुड़ कर देखना उतना ही मुश्किल होता है जितना भविष्य में झाँक लेना. 

चिट्ठियां बांटने के लिए मुझे कभी-कभार नदी पार करनी पड़ती है. बचपन में भी करनी पड़ती थी, स्कूल जाने लिए. कंधे पर झोला तब भी हुआ करता था जैसे आज है. बस किताबों की जगह चिट्ठियों ने ले ली है. 

ये नाव विक्रम मल्लाह की है जो उसे अपने पिता से मिली है. विक्रम मेरा सहपाठी हुआ करता था, हम साथ में इसी नाव से नदी पार कर पाठशाला जाया करते थे. विक्रम आज भी इसी नाव में है. वो रोजाना कई लोगों को नदी पार करवाता है. मुझे देख कर वो कुछ पल के लिए खुश हो जाया करता है. लेकिन अब हम ज्यादा बात नहीं करते, उसके पास कहने को कुछ नहीं.

शायद जीवन की एक तीसरी दिशा भी हुआ करती है जो न नदी के बहाव में बहती है और न ही बहाव के विरुद्ध. विक्रम उसी भंवर में उलझा हुआ इन दोनों दिशाओं को काटता हुआ अपनी नाव चलाता है. 

वो मुझसे नज़रे नहीं मिलाता शायद मुझे देख कर उसे पुराने दिन याद आते हैं. लेकिन वो तब तक घर नहीं जाता जब तक मैं चिट्ठियां बाँट कर शाम को वापस नदी पार करने न लौटूँ. विक्रम नदी की तरह शांत है. वो आज भी मेरा दोस्त है. 

चलिए किनारा पास है. झोला संभाल कर उतरा जाये. आपसे फिर मुलाकात होगी.

- पोस्टमैन


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