[Book Review] Suraj ka Satvan Ghoda by Dharamvir Bharati


A poster of Shyam Benegal's movie adaptation of the book.

जमुना के अल्हड़पन, लिली के स्नेह, सत्ती की ममता, तन्ना की ईमानदारी, रामधन की वफादारी, महेसर की धूर्तता व माणिक मुल्ला के जीवन की उठा-पटक से सुस्सजित, धर्मवीर भारती की भाषा से परिष्कृत यह लघु उपन्यास न केवल निम्न-मध्यम वर्ग के समक्ष खड़ी समस्याएं अपने ही अंदाज़ में इंगित करता है परन्तु प्रेम की समाज, अर्थ एवं देशकाल पर निर्भरता भी बखूबी बयां करता है. 

यूँ तो कहानी के मूल में लम्बी लम्बी जड़ें हैं, लेकिन जड़ों के सहारे खड़ा पेड़ जीवन से परिपूर्ण उसी तरह महकता है जैसे रात्रिकाल में रात की रानी. कुछ जानी पहचानी, कुछ अधूरी सी, मन का बोझ हल्का करती सुगंध. 'सूरज का सातवां घोडा', अपने प्रतीकात्मक मायने से दूर एक ऐसी अविरल संभावना है जो अपने आप में पूर्ण होते हुए भी एक जड़ मानवीय अधूरेपन को गढ़ती है. 

माणिक का मुल्ला का बौद्धिक जीवटता से ग्रस्त जीवन, उतना ही पूर्ण है जितना अपूर्ण. उसके द्वारा सुनाई गयी हर कहानी के आस पास मंडराता प्रायश्चित उतना ही निजी है जितना मौलिक. एक निरीह से अंधियारे से बाहर झांकता कहानी का मुख्य किरदार माणिक मुल्ला, किसी न किसी दरवाज़े पर खड़ा आपके जीवन का हर मौसम में आने वाला वो अतिथि है जो शायद कभी आपसे सीधा आँखें मिला के बात न करे पर बात कुछ निहित सच्चाई वाली कहता रहे. 

ये कहानी सूरज के उस घोड़े की है जो हम सब में मौजूद है, हमारा एक ऐसा अंश जो सदा अपने नयेपन पर इठलाता है. चाहे तन्ना की जीवनभर की कायरता हो, या जमुना का निरंतर सांसारिक होता जीवन, ये कहानी उस बदलाव की है जो हमारे मूल भाव से पृथक हम सब में निरंतर गतिशील है. 

जीवन का कहानी बन जाना और कहानी का जीवन हो जाना अगर मानवीय मूल्यों में किसी ने सफलता से प्रतिपादित किया है तो वो हैं धर्मवीर भारती. यूँ तो हर लेख अपने आप में अपने लेखक के जीवन का परिदृश्य होता है, लेकिन इस लघु उपन्यास में माणिक मुल्ला, धर्मवीर भारती के बेहद निकट दिखाई देते हैं. 

अनुभव, इतिहास एवं नितांत मानवीयता के तीन खम्भों पर खड़ा, भविष्य के सपने दिखाता व वर्तमान को नए सिरे से खोजता यह सूरज का सदैव तरुण सातवां घोड़ा निरंतर अग्रसर है, 'जीवन गीत' गाते हुए नए पड़ावों की ओर.   


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