हमारे देश का विकास भी ढ़लते सूरज की तरह है. जिसकी रौशनी में जितना दिखता है उस से ज़्यादा छुपा रह जाता है.

Photo courtesy: galimohalla.in


हरिमन काका का खेत अब शाम का सूरज नहीं देख पाता. बड़ी बड़ी इमारतों के कांच से छिटक कर आती धूप आँखों में इस तरह चुभती है जैसे पानी को तरसती फसल. 

विकास के नाम पर खड़े किये गए ये ढाँचे जब हवा-पानी के ही अवरोधक बन जाएँ तो इन्द्र देवता से बादलों की विनती करना बेमानी ही लगता है.  

हरिमन कहते हैं, "बेटा तुम तो पोस्टमास्टर हो, कभी इन लोगों के नाम भी चिट्ठी आती होगी? तुमने तो इन इमारतों को अंदर से देखा होगा?"

हमारे देश का विकास भी इस ढ़लते सूरज की तरह है. जिसकी रौशनी में जितना दिखता है उस से ज़्यादा छुपा रह जाता है. 

मैंने इन इमारतों को अंदर से देखा है. इन्हें न तो धूप से मतलब है और न ही बादलों से. और न ही परवाह है किसी खेत में खड़ी फसल की. मैंने बड़े-बड़े ढाँचे अंदर से देखे हैं, लेकिन हरिमन जितना बड़ा दिल किसी में नहीं पाया.

फिर भी मैंने उनकी बातों का जवाब नहीं दिया. न जाने किस तरह के सवाल मन में लिए हरिमन इन इमारतों को देखा करते हैं. अब भी वो फटी आँखों से इन इमारतों को देख रहें हैं और मैं उन्हें. 

फिर मुलाकात होगी

-हरिमन काका के साथ ढ़लते सूरज की दिशा में देखता आपका पोस्टमैन 

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