बचपन शायद अपने आप घटता है इसलिए सबसे ज्यादा याद आता है

photo: galimohalla.in


कभी कभी अपने काम से समय निकाल कर अपने आसपास घट रही छोटी-मोटी चीज़ों पर भी ध्यान देना चाहिए. चिट्ठियों का बस्ता एक दिन में खाली करने की आपाधापी में मेरी नज़रें साइकिल के अगले टायर पे और मेरा ध्यान अगले पते पर ही लगा रह जाता है. शायद अपनी मंज़िल को ध्यान में रख कर ज़िंदादिली से जीवन जीना ही सबसे मुश्किल काम है. 

अपने आप को ये बताना मुश्किल है कि मेरे जीवन की दो शामों में आखिर क्या फर्क रहा. कहाँ और कैसे मैं वो नहीं जो कल था और वो नहीं रहूँगा जो आज हूँ. 

मेरे सामने खेलती ये दो बच्चियां भूत है मेरे इतिहास के शुरूआती पन्नों की. वो पन्ने जिन पर ना जाने क्या क्या लिख आया हूँ. बचपन शायद अपने आप घटता है इसलिए सबसे ज्यादा याद आता है. शाम होते ही अब घर पहुंचने का ख्याल बचपन के उस घर से बाहर खेलने जाने के इरादे से कितना अलग है.  

मेरी माँ अक्सर कहा करती थी कि तू कभी थकता क्यूँ नहीं है. आज एहसास हुआ कि माँ को जवाब मालूम होता था. वो सब जानती थी. 

पर अब मैं थक जाया करता हूँ. मैं थोड़ी देर यहीं बैठूंगा. आप से फिर मुलाकात होगी.

आपका पोस्टमैन  


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