नदी को बहने के लिए किसी डाक टिकट की ज़रूरत नहीं होती. वो अपना रास्ता खुद चुनती है.

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शाम का सूरज कुछ अलग रंग लिए होता है. कुछ मटमैले, थके से रंग. इन रंगों में दिशाहीन-सी टोलियों में पंछी लम्बे लम्बे गोते लगा कर हवा में बहते से दिखाई देते हैं. पश्चिम में डूबता सूरज कितना कुछ हमारी नज़रों के सामने से हटा देता है. जैसे परछाइयों से भर जाता हो हर तरह का खालीपन. प्रकृति शायद कुछ समय के लिए हमारी नज़र कमज़ोर कर देती है. 

दिन भर चिट्ठियां बाँट कर मैं अक्सर यहाँ आया करता हूँ. दूर नदी के उस पार से कुछ आवाज़ें आया करती हैं. जैसे कोई पेड़ सांझ ढलते ही बुला रहा हो पंछियों को अपने अपने घोंसलों में लौटने को. 

दिन भर पते ढूंढते हुए जब मैं किसी खाली घर के आगे से गुजरता हूँ तो मुझे अक्सर ये नदी का किनारा याद आ जाता है. जैसे नदियाँ हमेशा बहती रहती हैं वैसे ही ये पुराने खाली घर समय के बहाव में बहते रहते हैं. 

नदी को बहने के लिए किसी डाक टिकट की ज़रूरत नहीं होती. वो अपना रास्ता खुद चुनती है. 

और समय? समय पर भी कोई टिकट लगता है भला. 

मेरा आज का काम ख़तम हुआ. मेरे चिट्ठियों के खाली बस्ते में मैंने मेरी टोपी रख ली है. नदी की महक मेरे कपड़ों में लिए अब मैं घर का रास्ता पकड़ता हूँ. फिर मुलाकात होगी.


-पोस्टमैन 


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