आदमी को कम से कम अपनी पैंट की जेब इतनी बड़ी बनवानी चाहिए कि उसमें एक पोस्टकार्ड तो समां सके, फिर दिल का बड़ा होना तो दूर की बात है.

Photo Courtesy: galimohalla.in


आदमी को कम से कम अपनी पैंट की जेब इतनी बड़ी बनवानी चाहिए कि उसमें एक पोस्टकार्ड तो समां सके, फिर दिल का बड़ा होना तो दूर की बात है. 

शाम के साये कुछ अलग रंग लिए होते हैं. जब धूप और छांव का अंतर मिटने लगता है और दूर किसी मंदिर में होती आरती की आवाज़ कानों में पड़ती है तब वो उठता है, आसमान से गिरते सूरज को हाथों में भर लेने को. कभी दो अगरबत्ती जला कर तो कभी एक लोटा पानी दिखा कर वो कामना करता है आने वाली सुबह के और उज्जवल होने की. 

साधु-सन्यासियों के नाम कोई चिट्ठी नहीं आती इसलिए उनके पास चिट्ठियां रखने के लिए जेब भी नहीं होती है. साधुओं का कोई ठिकाना नहीं होता.

मैंने मेरे जीवन में किसी साधु महात्मा का नाम नहीं पूछा. मैं बस उन्हें थोड़ी दूरी से देखा करता हूँ. शायद जीवन में कुछ चीज़ें अनजानी ही रहनी चाहिए, हर नाम से अगर लगाव हो गया तो पोस्टमास्टरी कैसे करूँगा. 

चलता हूँ फिर मुलाकात होगी

आपका अपना पोस्टमैन.       

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